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Sunday, December 2, 2018

ऊँटकटारा / ब्रह्मदंडी / उष्टकंटक

ऊँटकटारा / ब्रह्मदंडी / उष्टकंटक
 ऊँटकटेरा के क्षुप (झाड़ीनुमा पौधे) जंगलों में होते हैं इसकी टहनियां (डाल), फल और पत्ते सभी पर तेज कांटे होते हैं। ऊँटकटेरा वृक्ष की सभी टहनियों के ऊपर गोल फल होते हैं जो चारों तरफ करीब एक-एक इंच लंबे कांटों से भरा होता है। यह घरेलू जानवरों की बीमारी में विशेष रूप से प्रयोग की जाती है। इसकी शाखाएं जड़ से फूटती है । यह सूरजमुखी कुल का, सीधे तने वाला, काँटों से भरा हुआ, १-२ फुट की ऊँचाई वाला पौधा है। इसकी पत्तियां सत्यानाशी के पौधे जैसे ही फैली हुए और कांटेदार होती हैं। यह बहुशाखीय है । ऊँटकटारा के ढोढे होते हैं जिनपर कांटे होते हैं। इस पर नीले-बैंगनी रंग के छोटे-छोटे फूल गुच्छों में आते हैं। इसकी मूसला जड़ भूमि में बहुत अन्दर तक धंसी रहती हैं।
 आयुर्वेद चिकित्सा में जड़ की छाल का चूर्ण अधिकतर प्रयोग में लिया जाता है | इसके पीले रंग के डोडे लगते हैं, जिन पर कांटे होते हैं । इस वनस्पति को ऊँट बहुत-बहुत प्रेम से खाते हैं । यह पौधा मध्य भारत मालवा मारवाड़ संयुक्त प्रांत तथा दक्षिण में रेतीले प्रदेशों, बंजर खेतों मैदानों में पायी जाती है।
 रासायनिक संरचना - कई सक्रिय घटकों में से, एपिगेनिन, एपिगेनिन -7-ओ-ग्लूकोसाइड, इचिनाटिनिन, 5,7-डायहाइड्रोक्सी -8,4'-डायमेथॉक्सी-फ्लैवनोन -5-ओ-एल्फा-एल-हृनमोपाइरानोसील-7-ओ-बीटा-डी -र्बिनोपीरानोसिल- (1 → 4) -ओ-बीटा-डी-ग्लुकोपाइरानोसाइड है।