खेजड़ी या शमी
खेजड़ी या शमी एक वृक्ष है जो थार के मरुस्थल एवं अन्य स्थानों में पाया जाता है। यह वहां के लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। इसके अन्य नामों में घफ़ (संयुक्त अरब अमीरात), खेजड़ी, जांट/जांटी, सांगरी (राजस्थान), जंड (पंजाबी), कांडी (सिंध), वण्णि (तमिल), शमी, सुमरी (गुजराती) आते हैं। इसे फेद कीकर, खेजडो, समडी, शाई, बाबली, बली, चेत्त आदि भी कहा जाता है। इसका व्यापारिक नाम कांडी है। यह वृक्ष विभिन्न देशों में पाया जाता है जहाँ इसके अलग अलग नाम हैं। अंग्रेजी में यह प्रोसोपिस सिनेरेरिया नाम से जाना जाता है। खेजड़ी का वृक्ष जेठ के महीने में भी हरा रहता है। ऐसी गर्मी में जब रेगिस्तान में जानवरों के लिए धूप से बचने का कोई सहारा नहीं होता तब यह पेड़ छाया देता है। जब पेड़ बड़े हो जाते हैं तो हर वर्ष नवंबर-दिसम्बर में इनकी छंगाई करते हैं छंगाई से पत्तियों को सुखाने के बाद के बाद झाड़ कर अलग करके भंडारण कर लेते हैं बाद में चारे के लिए उपयोग करते हैं। पश्चिमी राजस्थान के कुछ जिलों जैसे जोधपुर,बाड़मेर तथा जैसलमेर में पेड़ों की छंगाई न करके हाथ में हरा लूंग इकट्ठा करके हरी अवस्था में ही पशुओं को विशेषकर बकरियो को खिलाते हैं जिससे बकरियों के दुग्ध उत्पादन में काफी इजाफा होता है। इसकी विधि में लूंग लेने में सिर्फ पत्तियां व छोटी शाखाएँ साथ में टूटती हैं, जिससे सांगरी उत्पादन प्रभावित नहीं होता; जबकि छंगाई करने से अगली ऋतु में अर्थात मार्च-अप्रैल में उनकी पेड़ों पर सांगरी नहीं आती। यानी केवल लूंग उत्पादन से संतुष्ट होना पड़ता है । इसका फूल मींझर कहलाता है। इसका फल सांगरी कहलाता है, जिसकी सब्जी बनाई जाती है। यह फल सूखने पर खोखा कहलाता है जो सूखा मेवा है। इसकी लकड़ी मजबूत होती है जो किसान के लिए जलाने और फर्नीचर बनाने के काम आती है। इसकी जड़ से हल बनता है। अकाल के समय रेगिस्तान के आदमी और जानवरों का यही एक मात्र सहारा है। सन १८९९ में दुर्भिक्ष अकाल पड़ा था जिसको छपनिया अकाल कहते हैं, उस समय रेगिस्तान के लोग इस पेड़ के तनों के छिलके खाकर जिन्दा रहे थे। इस पेड़ के नीचे अनाज की पैदावार ज्यादा होती है। १९८३ में इसे राजस्थान राज्य का राज्य वृक्ष घोषित कर दिया था।
