गोवत्स द्वादशी
पौराणिक जानकारी के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद माता यशोदा ने इसी
दिन गौमाता का दर्शन और पूजन किया था । ऐसी मान्यता है कि इस दिन पहली बार श्री
कृष्ण वन में गऊएं-बछड़े चराने गए थे । माता यशोदा ने श्री कृष्ण का शृंगार करके
गोचारण के लिए तैयार किया था ।
व्रतोत्सव के अनुसार भाद्रपद कृष्ण द्वादशी को मध्याह्न से पहले गोवत्स का
पूजन किया जाता है तथा मदनरत्नाकरन्तर्गत भविष्योत्तरपुराण (भविष्य०, उत्तररपर्व
६९) के अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी को किया जाता है । इसमें प्रदोषव्यापिनी
तिथि ली जाती है । यदि वह दो दिन हो या न हो तो 'वत्सपूजा वटश्चैव कर्तव्यो
प्रथमेऽहनि' के अनुसार पहले दिन व्रत करना चाहिये । उस दिन सांयकाल के समय गायें
चरकर वापस आयें तब तुल्य वर्ण की गौ और बछड़े का गन्धादि से पूजन करें ।
