Saturday, February 23, 2019

शीघ्र विवाह के उपाय



शीघ्र विवाह के उपाय 

1. शीघ्र विवाह के लिए सोमवार को 1200 ग्राम चने की दाल व सवा लीटर कच्चे दूध का दान करें। यह प्रयोग तब तक करते रहना है जब तक कि विवाह न हो जाय ।

2. जिन लड़कों का विवाह नहीं हो रहा हो या प्रेम विवाह में विलंब हो रहा हो, उन्हें शीघ्र मनपसंद विवाह के लिए श्रीकृष्ण के इस मंत्र का 108 बार जप करना चाहिए ।

“क्लीं कृष्णाय गोविंदाय गोपीजनवल्लभाय स्वाहा।”

Friday, February 22, 2019

अष्टमूर्त्यष्टक स्तोत्र / अष्टमूर्तिस्तव / मूर्त्यष्टकस्तोत्र


अष्टमूर्त्यष्टक स्तोत्र / अष्टमूर्तिस्तव / मूर्त्यष्टकस्तोत्र


ब्रह्माजी के देवर्षि नारद, अंगिरा और भृगु तीन मानस पुत्र थे। अंगिरा के पुत्र बृहस्पति थे और भृगु के पुत्र का नाम कवि (शुक्र) था। महर्षि अंगिरा बृहस्पति और कवि को शिक्षा देने लगे और भृगु तपस्या के लिए वन में चले गए। कवि कुशाग्रबुद्धि होने से पढ़ने में तेज थे इसलिए अंगिरा पुत्रमोह के कारण दोनों बच्चों की शिक्षा में भेदभाव करने लगे। कवि ने जब देखा कि बृहस्पति की तरह उसे उतनी शिक्षा नहीं मिल रही है तो वह ऋषि अंगिरा की अनुमति लेकर किसी दूसरे गुरु की खोज में चल दिए। गौतम ऋषि के आश्रम में जाकर कवि ने उनसे संसार के सर्वश्रेष्ठ गुरु के बारे में पूछा। महर्षि गौतम बोले-'तीनों लोकों में तो सर्वश्रेष्ठ गुरु भगवान शंकर हैं। तुम उनकी शरण में जाओ।'

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Sunday, January 27, 2019

ब्रह्माकृत भगवान्-स्तुती — भागवत पुराण


ब्रह्माकृत भगवान्-स्तुती — भागवत पुराण

॥ ब्रह्मोवाच ॥
ज्ञातोऽसि मेऽद्य सुचिरान्ननु देहभाजां
न ज्ञायते भगवतो गतिरित्यवद्यम् ।
नान्यत्त्वदस्ति भगवन्नपि तन्न शुद्धं
मायागुणव्यतिकराद् यदुरुर्विभासि ॥ १ ॥
रूपं यदेतदवबोधरसोदयेन ।
शश्वन्निवृत्ततमसः सदनुग्रहाय ।
आदौ गृहीतमवतारशतैकबीजं ।
यन्नाभिपद्मभवनाद् अहमाविरासम् ॥ २ ॥

Monday, January 21, 2019

श्रीमद्भागवतपुराण कुन्तीकृत श्रीकृष्ण स्तुति

श्रीमद्भागवतपुराण कुन्तीकृत श्रीकृष्ण स्तुति

नमस्ये पुरुषं त्वद्यमीश्वरं प्रकृते: परम् ।
अलक्ष्यं सर्वभूतानामन्तर्बहिरवास्थितम् ॥१॥
भावार्थ - 'हे प्रभो ! आप सभी जीवों के बाहर और भीतर एकरस स्थित हैं, फिर भी इन्द्रियों और वृत्तियों से देखे नहीं जाते क्योंकि आप प्रकृति से परे आदिपुरुष परमेश्वर हैं। मैं आपको बारम्बार नमस्कार करती हूँ।

मायाजवनिकाच्छन्नमज्ञाधोक्षमव्ययम् ।
न लक्ष्यसे मूढदृशा नटो नाटयधरो यथा ॥२॥
भावार्थ - इन्द्रियों से जो कुछ जाना जाता है, उसकी तह में आप ही विद्यमान रहते हैं और अपनी ही माया के पर्दे से अपने को ढके रहते हैं। मैं अबोध नारी आप अविनाशी पुरुषोत्तम को भला, कैसे जान सकती हूँ? हे लीलाधर ! जैसे मूढ़ लोग दूसरा भेष धारण किये हुए नट को प्रत्यक्ष देखकर भी नहीं पहचान सकते, वैसे ही आप दिखते हुए भी नहीं दिखते।

Tuesday, January 8, 2019

बुध के जन्म की कथा



बुध के जन्म की कथा
पौरोणिक कथानकों के अनुसार -
श्रीकृष्ण बोले — प्रजापति (ब्रह्मा) की पुत्री जो वृत्रासुर की कनिष्ठा भगिनी है 'तारा' नाम से विख्यात है । उस त्रैलोक्य सुन्दरी को उन्होंने देवों के आचार्य बृहस्पति को सविधान अर्पित किया । यद्यपि उस सुन्दरी तारा के रूपलावण्य द्वारा वे दोनों अत्यन्त मदन व्यथित थे तथापि वह अन्य स्त्रियों की भाँति बृहस्पति की सेवा करती थी । 

उस विशाल लोचना को, जो सौन्दर्य के निधान एवं मुग्धहास करने वाली थी, देखते ही चन्द्रमा काम पीडित होने लगे । उन्होंने संकेत करते हुए उससे मधुर शब्दों में कहा — तारा! आओ, आओ! विलम्ब न करो ।