Friday, December 7, 2018

शिवाचतुर्थी व्रत


शिवाचतुर्थी
( भविष्यपुराण ) - शिवा, शान्ता और सुखा - ये ३ चतुर्थी होती हैं । इनमें भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीकी ' शिवा ' संज्ञा है । इसमें स्त्रान, दान, जप और उपवास करनेसे सौगुना फल होता है । स्त्रियाँ यदि इस दिन गुड़, घी, लवण और अपूपादिसे अपने सास - श्वशुर या माँ आदिको तृप्त करे तो उनके सौभाग्यकी वृद्धि होती है । ( माघ शुक्ल चतुर्थी शान्ता और भौमप्रयुक्त सुखा होती है । )

( भविष्यपुराण ) - शिवा, शान्ता और सुखा - ये ३ चतुर्थी होती हैं । इनमें भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीकी ' शिवा ' संज्ञा है । इसमें स्त्रान, दान, जप और उपवास करनेसे सौगुना फल होता है । स्त्रियाँ यदि इस दिन गुड़, घी, लवण और अपूपादिसे अपने सास - श्वशुर या माँ आदिको तृप्त करे तो उनके सौभाग्यकी वृद्धि होती है । ( माघ शुक्ल चतुर्थी शान्ता और भौमप्रयुक्त सुखा होती है । )
इसे कलंक चतुर्थी और सिद्धिविनायक चतुर्थी भी कहा जाता है। देखा जाए तो अधिकांश मनुष्य किसी भी प्रकार का विघ्न आने से भयभीत हो उठते हैं। गणेश जी की पूजा होने से विघ्न समाप्त हो जाता है।


सिद्धिविनायकव्रत
( कृत्यरत्नावली ) - यह भाद्रपद शुक्ल चतुर्थीको किया जाता है । इस दिन गणेशजीका मध्याह्नमें जन्म हुआ था, अतः इसमें मध्याह्नव्यापिनी तिथि ली जाती है । यदि वह दो दिन हो या दिनो दिन न होतो ' मातृविद्धा प्रशस्यते ' के अनुसार पूर्वविद्धा लेनी चाहिये । इस दिन रवि या भौमवार हो तो यह ' महाचतुर्थी ' हो जाती है । इस दिन रात्रिमें चन्द्रदर्शन करनेसे मिथ्या कलड्क लग जाता है । उसके निवारणके निमित्त स्यमन्तककी तथा श्रवण करना आवश्यक है* । अस्तु, व्रतके दिन प्रातःस्त्रानादि करके ' मम सर्वकर्मसिद्धये सिद्धिविनायकपूजनमहं करिष्ये' से संकल्प करके ' स्वास्तिक ' मण्डलपर प्रत्यक्ष अथवा स्वर्णादिनिर्मित मूर्ति स्थापन करके पुष्पार्पणपर्यन्त पूजन करे और फिर १३ ' नामपूजा ' और २१ ' पत्रपूजा ' करके धूप, दीपादिसे शेष उपचार सम्पन्न करे । अन्तमें घृतपाचित २१ मोदक अर्पण करके ' विघ्रानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक । कार्यं मे सिद्धिमायातु पूजिते त्वयि धातरि ॥' से प्रार्थना करे और मोदकादि वितरण करके एक बार भोजन करे । इस दिन राजपूताना प्रान्तमें प्राचीन शैलीकी पाठशालाओंके छात्रगण बड़ी धूमधामसे ' गणपतिचतुर्थी ' मनाते हैं और महाराष्ट्रदेशमें इसके महोत्सव होते हैं ।
तरह-तरह की मनोकामना पूरी करने के लिए विनायक कई उपाय बताते हैं। अगर आपको अपने दुश्मनों को रोकना है तो फिर गणेश भगवान के पीली कांति वाले स्वरूप का ध्यान करना होगा। किसी को अपने वश में करना है तो उनके अरुण कांतिमय स्वरूप का मन ही मन ध्यान करें। किसी के मन में अपने लिए प्रेम पैदा करना है तो लाल रंग वाले गणेश जी का ध्यान करें। बलवान आदि होने के लिए भी इसी रूप का ध्यान करें। जिनको धन पाने की इच्छा हो, उन्हें हरे रंग के गणेशपूजा करनी चाहिए और जिन्हें मोक्ष प्राप्त करना है, उन्हें सफेद रंग के गणपति की पूजा करनी चाहिए। लेकिन इन कार्यों में पूरी सफलता तभी मिलेगी, जब आप तीनों समय गणपति का ध्यान और जाप करेंगे। .
इस दिन मध्याह्न में गणपति पूजा में 21 मोदक अर्पण करके- ‘विघ्नानि नाशमायान्तु सर्वाणि सुरनायक। कार्यं मे सिद्धिमायातु पूजिते त्वयि धातरि', मंत्र से प्रार्थना करें। गणेश को अर्पित किया गया नैवेद्य सबसे पहले उनके सेवकों- गालव, गार्ग्य, मंगल और सुधाकर को देना चाहिए। चंद्रमा, देवाधिदेव गणेश और चतुर्थी माता को दिन में अर्घ्य अर्पित करें। संभव हो तो रात्रि में विनायक कथा सुनें या भजन करें।

* श्रीकृष्णकी द्वारकापुरीमें सत्राजितने सूर्यकी उपासनासे सूर्यसमान प्रकाशवाली और प्रतिदिन आठ भार सुवर्ण देनेवाली ' स्यमन्तक ' मणि प्राप्त की थी । एक बार उसे संदेह हुआ कि शायद श्रीकृष्ण इसे छीन लेगे । यह सोचकर उसने वह मणि अपने भाई प्रसेनको पहना दी । दैवयोगसे वनमें शिकारके लिये गये हुए प्रसेनको सिंह खा गया और सिंहासे वह मणि ' जाम्बवान् ' छीन ले गये । इससे श्रीकृष्णपर यह कलङ्क लग गया कि ' मणिके लोभसे उन्होंनें प्रसेनको मार डाला ।' अन्तर्यामी श्रीकृष्ण जाम्बवानकी गुहामें गये और २१ दिनतक घोर युद्ध करके उनकी पुत्री जाम्बवतीको तथा स्यमन्तकमणिको ले आये । यह देखकर सत्राजित्ने वह मणि उन्हींको अर्पण कर दी । कलङ्क दुर हो गया ।'

चतुर्थी तिथि शुरू होने से लेकर खत्म होने तक चन्द्रमा का दर्शन नहीं करना चाहिए। यदि भूल से गणेश चतुर्थी के दिन चन्द्रमा के दर्शन हो जाएं तो मिथ्या दोष से बचाव के लिए निम्नलिखित मंत्र का जाप करना चाहिए तथा दी गई कथा का श्रवण करना चाहिए ...
"सिंह: प्रसेनमवधीत्सिंहो जाम्बवता हत:।
सुकुमारक मारोदीस्तव ह्येष स्यमन्तकर:"

स्यमन्तक मणि की कथा
एक बार नंदकिशोर ने सनतकुमारों से कहा कि चौथ की चंद्रमा के दर्शन करने से श्रीकृष्ण पर जो लांछन लगा था, वह सिद्धिविनायक व्रत करने से ही दूर हुआ था। ऐसा सुनकर सनतकुमारों को आश्चर्य हुआ।
उन्होंने पूर्णब्रह्म श्रीकृष्ण को कलंक लगने की कथा पूछी तो नंदकिशोर ने बताया- एक बार जरासंध के भय से श्रीकृष्ण समुद्र के मध्य नगरी बसाकर रहने लगे। इसी नगरी का नाम आजकल द्वारिकापुरी है। द्वारिकापुरी में निवास करने वाले सत्राजित यादव ने सूर्यनारायण की आराधना की। तब भगवान सूर्य ने उसे नित्य आठ भार सोना देने वाली स्यमन्तक नामक मणि अपने गले से उतारकर दे दी।
मणि पाकर सत्राजित यादव जब समाज में गया तो श्रीकृष्ण ने उस मणि को प्राप्त करने की इच्छा व्यक्त की। सत्राजित ने वह मणि श्रीकृष्ण को न देकर अपने भाई प्रसेनजित को दे दी। एक दिन प्रसेनजित घोड़े पर चढ़कर शिकार के लिए गया। वहां एक शेर ने उसे मार डाला और मणि ले ली। रीछों का राजा जामवन्त उस सिंह को मारकर मणि लेकर गुफा में चला गया। जब प्रसेनजित कई दिनों तक शिकार से न लौटा तो सत्राजित को बड़ा दुख हुआ। उसने सोचा, श्रीकृष्ण ने ही मणि प्राप्त करने के लिए उसका वध कर दिया होगा। अतः बिना किसी प्रकार की जानकारी जुटाए उसने प्रचार कर दिया कि श्रीकृष्ण ने प्रसेनजित को मारकर स्यमन्तक मणि छीन ली है।
इस लोक-निंदा के निवारण के लिए श्रीकृष्ण बहुत से लोगों के साथ प्रसेनजित को ढूंढने वन में गए। वहां पर प्रसेनजित को शेर द्वारा मार डालना और शेर को रीछ द्वारा मारने के चिह्न उन्हें मिल गए। रीछ के पैरों की खोज करते-करते वे जामवन्त की गुफा पर पहुंचे और गुफा के भीतर चले गए। वहां उन्होंने देखा कि जामवन्त की पुत्री उस मणि से खेल रही है। श्रीकृष्ण को देखते ही जामवन्त युद्ध के लिए तैयार हो गया। युद्ध छिड़ गया। गुफा के बाहर श्रीकृष्ण के साथियों ने उनकी सात दिन तक प्रतीक्षा की। फिर वे लोग उन्हें मर गया जानकर पश्चाताप करते हुए द्वारिकापुरी लौट गए। इधर इक्कीस दिन तक लगातार युद्ध करने पर भी जामवन्त श्रीकृष्ण को पराजित न कर सका। तब उसने सोचा, कहीं यह वह अवतार तो नहीं जिसके लिए मुझे रामचंद्रजी का वरदान मिला था। यह पुष्टि होने पर उसने अपनी कन्या का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया और मणि दहेज में दे दी। श्रीकृष्ण जब मणि लेकर वापस आए तो सत्राजित अपने किए पर बहुत लज्जित हुआ। इस लज्जा से मुक्त होने के लिए उसने भी अपनी पुत्री का विवाह श्रीकृष्ण के साथ कर दिया।
कुछ समय के बाद श्रीकृष्ण किसी काम से इंद्रप्रस्थ चले गए। तब अक्रूर तथा ऋतु वर्मा की राय से शतधन्वा यादव ने सत्राजित को मारकर मणि अपने कब्जे में ले ली। सत्राजित की मौत का समाचार जब श्रीकृष्ण को मिला तो वे तत्काल द्वारिका पहुंचे। वे शतधन्वा को मारकर मणि छीनने को तैयार हो गए।
इस कार्य में सहायता के लिए बलराम भी तैयार थे। यह जानकर शतधन्वा ने मणि अक्रूर को दे दी और स्वयं भाग निकला। श्रीकृष्ण ने उसका पीछा करके उसे मार तो डाला, पर मणि उन्हें नहीं मिल पाई। बलरामजी भी वहां पहुंचे। श्रीकृष्ण ने उन्हें बताया कि मणि इसके पास नहीं है। बलरामजी को विश्वास न हुआ। वे अप्रसन्न होकर विदर्भ चले गए। श्रीकृष्ण के द्वारिका लौटने पर लोगों ने उनका भारी अपमान किया। तत्काल यह समाचार फैल गया कि स्यमन्तक मणि के लोभ में श्रीकृष्ण ने अपने भाई को भी त्याग दिया।
श्रीकृष्ण इस अकारण प्राप्त अपमान के शोक में डूबे थे कि सहसा वहां नारदजी आ गए। उन्होंने श्रीकृष्णजी को बताया- आपने भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के चंद्रमा का दर्शन किया था। इसी कारण आपको इस तरह लांछित होना पड़ा है।

श्रीकृष्ण ने पूछा- चौथ के चंद्रमा को ऐसा क्या हो गया है जिसके कारण उसके दर्शनमात्र से मनुष्य कलंकित होता है? तब नारदजी बोले- एक बार ब्रह्माजी ने चतुर्थी के दिन गणेशजी का व्रत किया था। गणेशजी ने प्रकट होकर वर मांगने को कहा तो उन्होंने मांगा कि मुझे सृष्टि की रचना करने का मोह न हो।
गणेशजी ज्यों ही 'तथास्तु' कहकर चलने लगे, उनके विचित्र व्यक्तित्व को देखकर चंद्रमा ने उपहास किया। इस पर गणेशजी ने रुष्ट होकर चंद्रमा को शाप दिया कि आज से कोई तुम्हारा मुख नहीं देखना चाहेगा।
शाप देकर गणेशजी अपने लोक चले गए और चंद्रमा मानसरोवर की कुमुदिनियों में जा छिपा। चंद्रमा के बिना प्राणियों को बड़ा कष्ट हुआ। उनके कष्ट को देखकर ब्रह्माजी की आज्ञा से सारे देवताओं के व्रत से प्रसन्न होकर गणेशजी ने वरदान दिया कि अब चंद्रमा शाप से मुक्त तो हो जाएगा, पर भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को जो भी चंद्रमा के दर्शन करेगा, उसे चोरी आदि का झूठा लांछन जरूर लगेगा। किंतु जो मनुष्य प्रत्येक द्वितीया को दर्शन करता रहेगा, वह इस लांछन से बच जाएगा। इस चतुर्थी को सिद्धिविनायक व्रत करने से सारे दोष छूट जाएंगे।
यह सुनकर देवता अपने-अपने स्थान को चले गए। इस प्रकार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी को चंद्रमा का दर्शन करने से आपको यह कलंक लगा है। तब श्रीकृष्ण ने कलंक से मुक्त होने के लिए यही व्रत किया था।
कुरुक्षेत्र के युद्ध में युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से पूछा- भगवन्! मनुष्य की मनोकामना सिद्धि का कौन-सा उपाय है? किस प्रकार मनुष्य धन, पुत्र, सौभाग्य तथा विजय प्राप्त कर सकता है?
यह सुनकर श्रीकृष्ण ने उत्तर दिया- यदि तुम पार्वती पुत्र श्री गणेश का विधिपूर्वक पूजन करो तो निश्चय ही तुम्हें सब कुछ प्राप्त हो जाएगा। तब श्रीकृष्ण की आज्ञा से ही युधिष्ठिरजी ने गणेश चतुर्थी का व्रत करके महाभारत का युद्ध जीता था।

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