Saturday, December 8, 2018

नागलोक


नागलोक
वराहपुराण में नागो की उत्पत्ति के संबंध में यह कथा लिखी है । सृष्टि के आरंभ में कश्यप उत्पन्न हुए । उनकी पत्नी कद्रू से उन्हें ये पुत्र उत्पन्न हुए— अनन्त, वासुकि, कालिय, धनंजय, कर्कोटक, तक्षक, पद्म, ऐरावत, महापद्म, शंकु, शंक, संवरण, धृतराष्ट्र, दुर्धर्ष, दुर्जय, दुर्मुख, बल, गोक्ष, गोकामुख तथा विरूप आदि को कद्रू ने जन्म दिया था। कश्यप के ये सब पुत्र नाग कहलाए । इनके पुत्र, पौत्र बहुत ही क्रूर और विषधर हुए । इनसे प्रजा क्रमशः क्षीण होने लगी । प्रजा ने जाकर ब्रह्मा के यहाँ पुकार की, ब्रह्मा ने नागों को बुलाकर कहा, जिस प्रकार तुम हमारी सृष्टि का नाश कर रहे हो उसी प्रकार माता के शाप से तुम्हारा भी नाश होगा । नागों ने डरते डरते कहा— महाराज, आप ही ने हमें कुटिल और विषधर बनाया, हमारा क्या अपराध है? अब हम लोगों के रहने के लिये कोई अलग स्थान बतलाइए जहाँ हम लोग सुख से पडे रहें । ब्रह्मा ने उनके रहने के लिये पाताल, वितल और सुतल ये तीन स्थान या लोक बतला दिए । लक्ष्मी के अंश से प्रकट हुई मनसादेवी कद्रू की कन्या हैं। ये तपस्विनी स्त्रियों में श्रेष्ठ, कल्याणस्वरूपा और महातेजस्विनी हैं। इन्हीं का दूसरा नाम जरत्कारु है। इन्हीं के पति मुनिवर जरत्कारु थे, जो नारायण की कला से प्रकट हुए थे। विष्णु तुल्य तेजस्वी आस्तीक इन्हीं मनसा देवी के पुत्र हैं।

इस भू-भाग को प्राचीनकाल में प्रमुख रूप से 3 भागों में बांटा गया था- इंद्रलोक, पृथ्वी लोक और पाताल लोक। इंद्रलोक हिमालय और उसके आसपास का क्षेत्र तथा आसमान तक, पृथ्वी लोक अर्थात जहां भी जल, जंगल और समतल भूमि रहने लायक है और पाताल लोक अर्थात रेगिस्तान और समुद्र के किनारे के अलावा समुद्र के अंदर के लोक। पाताल लोक भी 7 प्रकार के बताए गए हैं। हिन्दू धर्म में पाताल लोक की स्थिति पृथ्वी के नीचे बताई गई है। नीचे से अर्थ समुद्र में या समुद्र के किनारे। पाताल लोक में नाग, दैत्य, दानव और यक्ष रहते हैं। राजा बालि को भगवान विष्णु ने पाताल के सुतल लोक का राजा बनाया है और वह तब तक राज करेगा, जब तक कि कलियुग का अंत नहीं हो जाता।
हिन्दू धर्म में पाताल लोक की स्थिति पृथ्वी के नीचे बताई गई है। नीचे से अर्थ समुद्र में या समुद्र के किनारे। पाताल लोक में नाग, दैत्य, दानव और यक्ष रहते हैं। राजा बालि को भगवान विष्णु ने पाताल के सुतल लोक का राजा बनाया है और वह तब तक राज करेगा, जब तक कि कलियुग का अंत नहीं हो जाता।
हिन्दू धर्मग्रंथों में पाताल लोक से संबंधित असंख्य घटनाओं का वर्णन मिलता है। कहते हैं कि एक बार माता पार्वती के कान की बाली (मणि) यहां गिर गई थी और पानी में खो गई। खूब खोज-खबर की गई, लेकिन मणि नहीं मिली। बाद में पता चला कि वह मणि पाताल लोक में शेषनाग के पास पहुंच गई है। जब शेषनाग को इसकी जानकारी हुई तो उसने पाताल लोक से ही जोरदार फुफकार मारी और धरती के अंदर से गरम जल फूट पड़ा। गरम जल के साथ ही मणि भी निकल पड़ी।
पुराणों में पाताल लोक के बारे में सबसे लोकप्रिय प्रसंग भगवान विष्णु के अवतार वामन और राजा बलि का माना जाता है। बलि ही पाताल लोक के राजा माने जाते थे। बंगाल की खाड़ी के आसपास नागलोक होने का जिक्र है। यहां नाग संप्रदाय भी रहता था। पुराणों के अनुसार भू-लोक यानी पृथ्वी के नीचे 7 प्रकार के लोक हैं जिनमें पाताल लोक अंतिम है। पाताल लोक को नागलोक का मध्य भाग बताया गया है। पाताल लोकों की संख्या 7 बताई गई है।
विष्णु पुराण के अनुसार पूरे भू-मंडल का क्षेत्रफल 50 करोड़ योजन है। इसकी ऊंचाई 70 सहस्र योजन है। इसके नीचे ही 7 लोक हैं जिनमें क्रम अनुसार पाताल नगर अंतिम है। 7 पाताल लोकों के नाम इस प्रकार हैं- 1. अतल, 2. वितल, 3. सुतल, 4. रसातल, 5. तलातल, 6. महातल और 7. पाताल।
1. अतल : अतल में मय दानव का पुत्र असुर बल रहता है। उसने छियानवे प्रकार की माया रची है।
2. वितल : उसके वितल लोक में भगवान हाटकेश्वर नामक महादेवजी अपने पार्षद भूतगणों सहित रहते हैं। वे प्रजापति की सृष्टि वृद्धि के लिए भवानी के साथ विहार करते रहते हैं। उन दोनों के प्रभाव से वहां हाट की नाम की एक सुंदर नदी बहती है।
3. सुतल : वितल के नीचे सुतल लोक है। उसमें महायशश्वी पवित्रकीर्ति विरोचन के पुत्र बलि रहते हैं। वामन रूप में भगवान ने जिनसे तीनों लोक छीन लिए थे।
4. तलातल : सुतल लोक से नीचे तलातल है। वहां त्रिपुराधिपति दानवराज मय रहता है। मयदानव विषयों का परम गुरु है।
5.महातल : उसके नीचे महातल में कश्यप की पत्नी कद्रू से उत्पन्न हुए अनेक सिरों वाले सर्पों का ‘क्रोधवश’ नामक एक समुदाय रहता है। उनमें कहुक, तक्षक, कालिया और सुषेण आदि प्रधान नाग हैं। उनके बड़े-बड़े फन हैं।
6. रसातल : उनके नीचे रसातल में पणि नाम के दैत्य और दानव रहते हैं। ये निवातकवच, कालेय और हिरण्यपुरवासी भी कहलाते हैं। इनका देवताओं से सदा विरोध रहता है।
7. पाताल : रसातल के नीचे पाताल है। वहां शंड्‍ड, कुलिक, महाशंड्ड, श्वेत, धनंजय, धृतराष्ट्र, शंखचूड़, कम्बल, अक्षतर और देवदत्त आदि बड़े क्रोधी और बड़े-बड़े फनों वाले नाग रहते हैं। इनमें वासुकि प्रधान है। उनमें किसी के 5, किसी के 7, किसी के 10, किसी के 100 और किसी के 1000 सिर हैं। उनके फनों की दमकती हुई मणियां अपने प्रकाश से पाताल लोक का सारा अंधकार नष्ट कर देती हैं।
नागलोक से सम्बन्धित पौरोणिक आख्यान
रामायण में भी अहिरावण द्वारा राम-लक्ष्मण का हरण कर पाताल लोक ले जाने पर श्री हनुमान के वहां जाकर अहिरावण का वध करने का प्रसंग आता है। इसके अलावा भी ब्रह्मांड के 3 लोकों में पाताल लोक का भी धार्मिक महत्व बताया गया है।
नारद द्वारा नागलोक के नागों का वर्णन नारद जी बोले- मातले! यह नागराज वासुकि द्वारा सुरक्षित उनकी भोगवती नामक पुरी है। देवराज इन्द्र की सर्वश्रेष्ठ नगरी अमरावती की तरह ही यह भी सुख समृद्धि से सम्पन्न है। ये शेषनाग स्थित है, जो अपने लोक प्रसिद्ध तपोबल से प्रभाव सहित इस सारी पृथ्वी को सदा सिर पर धारण करते हैं। भगवान शेषनाग का शरीर कैलास पर्वत के समान श्वेत है। ये सहस्र मस्तक धारण करते हैं। इनकी जिह्वा अग्नि की ज्वाला के समान जान पड़ती है। ये महाबली अनंत दिव्य आभूषणों से विभूषित होते हैं। यहाँ सुरसा के पुत्र नागगण शोक-संताप से रहित होकर निवास करते हैं। इनके रूप-रंग और आभूषण अनेक प्रकार के हैं। ये सभी नाग सहसत्रों की संख्या में यहाँ रहते हैं। ये सब के सब अत्यंत बलवान तथा स्वभाव से ही भयंकर हैं। इनमें से किन्हीं के शरीर में मणिका, किन्हीं के स्वस्तिक का, किन्हीं के चक्र का और किन्हीं के शरीर में कमंडल का चिह्न है। कुछ नागों के एक सहस्र सिर होते हैं, किन्हीं के पाँच सौ, किन्हीं के एक सौ और किन्हीं के तीन ही सिर होते हैं। कोई दो सिर वाले, कोई पाँच सिर वाले और कोई सात मुख वाले होते हैं। किन्हीं के बड़े-बड़े फन, किन्हीं के दीर्घ शरीर और किन्हीं के पर्वत के समान स्थूल शरीर होते हैं यहाँ एक-एक वंश के नागों की कई हजार, कई लाख तथा कई अबुर्द संख्या है। मैं जेठे-छोटे के क्रम से इनका संक्षिप्त परिचय देता हूँ, सुनो। वासुकि, तक्षक, कर्कोटक, धनंजय, कालिय, नहुष, कंबल, अश्वतर, बाह्यकुंड, मणिनाग, आपूरण, खग, वामन, एलपत्र, कुकुर, कुकुण, आर्यक, नंदक, कलश, पोतक, कैलासक, पिंजरक, ऐरावत, सुमनोमुख, दधिमुख, शंख, नन्द, उपनन्द, आप्त, कोटरक, शिखी, निष्ठुरिक, तित्तिरि, हस्तिभद्र, कुमुद, माल्यपिण्डक, पद्मनामक दो नाग, पुण्डरीक, पुष्प, मुद्गरपर्णक , करवीर, पीठरक, संवृत्त, वृत्त, पिंडार, विल्वपत्र, मूषिकाद, शिरीषक, दिलीप, शंखशीर्ष, ज्योतिष्क, अपराजित, कौरव्य, धृतराष्ट्र, कुहुर, कृषक, विरजा, धारण, सुबाहु, मुखर, जय, बधिर, अंध, विशुंडी, विरस तथा सुरस । (महाभारत उद्योग पर्व अध्याय 103 श्लोक 1-26)
भीम नागलोक में
एक बार अवसर पाकर दुर्योधन ने भीम को विषयुक्त भोजन खिला दिया। भोजन के पश्चात् सब बालक वहीं सो गये। भीम को विष के प्रभाव से मूर्छा आ गई। मूर्छित हुये भीम को दुर्योधन ने गंगा में डुबा दिया। मूर्छित अवस्था में ही भीम डूबते-उतराते नागलोक में पहुँच गये। वहाँ पर उन्हें भयंकर विषधर नाग डसने लगे तथा विषधरों के विष के प्रभाव से भीम के शरीर के भीतर का विष नष्ट हो गया और वे सचेतावस्था में आ गये। चेतना लौट आने पर उन्हों ने नागों को मारना आरम्भ कर दिया और एक के पश्चात् एक नाग मरने लगे।
भीम के इस विनाश लीला को देख कर कुछ नाग भागकर अपने राजा वासुकि के पास पहुँचे और उन्हें समस्त घटना से अवगत कराया। नागराज वासुकि अपने मन्त्री आर्यक के साथ भीम के पास आये। आर्यक नाग ने भीम को पहचान लिया और उनका परिचय राजा वासुकि को दिया। वासुकि नाग ने भीम को अपना अतिथि बना लिया। नागलोक में आठ ऐसे कुण्ड थे जिनके जल को पीने से मनुष्य के शरीर में हजारों हाथियों का बल प्राप्त हो जाता था। नागराज वासुकि ने भीम को उपहार में उन आठों कुण्डों का जल पिला दिया। कुण्डो के जल पी लेने के बाद भीम गहन निद्रा में चले गये। आठवें दिन जब उनकी निद्रा टूटी तो उनके शरीर में हजारों हाथियों का बल आ चुका था। भीम के विदा माँगने पर नागराज वासुकी ने उन्हें उनकी वाटिका में पहुँचा दिया।

अर्जुन नागलोक में
उलूपी ऐरावत वंश के कौरव्य नामक नाग की कन्या थी। इस नाग कन्या का विवाह एक बाग से हुआ था। इसके पति को गरुड़ ने मारकर खा लिया जिससे यह विधवा हो गयी। एक बार अर्जुन, जो प्रतिज्ञा भंग करने के कारण बारह वर्ष का वनवास कर रहे थे, ब्रह्मचारी के वेश में तीर्थाटन करते हुए गंगा द्वार के निकट पहुँचें जहाँ इससे उनका साक्षात्कार हुआ।
उलूपी अर्जुन को देखकर उनपर विमुग्ध हो गयी। वह अर्जुन को पाताल लोक में ले गयी और उनसे विवाह करने का अनुरोध किया। अपनी मनोकामना पूर्ण होने पर उसने अर्जुन को समस्त जलचरों का स्वामी होने का वरदान दिया। जिस समय अर्जुन नागलोक में निवास कर रहे थे, उस समय चित्रांगदा से उत्पन्न अर्जुन का पुत्र वभ्रुवाहन, जो अपने नाना, मणिपुर नरेश का उत्तराधिकारी था, उनके स्वागत के लिए उनके पास आया। वभ्रुवाहन को युद्ध-सज्जा में न देखकर यथोचित व्यवहार नहीं किया। उलूपी वभ्रुवाहन की देख-रेख कर चुकने के कारण उस पर अपना प्रभाव रखती थी। उसने वभ्रुवाहन को अर्जुन के विरुद्ध भड़काया। फलतः पिता और पुत्र में युद्ध हुआ।
उलूपी की माया के प्रभाव से वभ्रुवाहन अर्जुन को मार डालने में समर्थ हुआ किन्तु अपने इस कार्य के लिए उसे इतना दुःख हुआ कि उसने आत्म-हत्या करने का निश्चय किया। वभ्रुवाहन के संकल्प को जानकर उलूपी ने एक मणि की सहायता से अर्जुन को पुनः जीवनदान दिया। विष्णु पुराण के अनुसार अर्जुन से उलूपी ने इरावत नामक पुत्र को जन्म दिया। उलूपी अर्जुन के सदेह स्वगारोहण के समय तक उनके साथ थी।

गणेश बने नागलोक के राजा
गणेश पुराण में उल्लिखित कथा के अनुसार एक बार बाल गणेश अपनी उम्र के अन्य बच्चों के साथ पराशर ऋषि के आश्रम में खेल रहे थे। अचानक वहां एक नाग कन्या प्रकट हुई और गणेश भगवान को अपने साथ नागलोक की तरफ प्रस्थान करने का आग्रह करने लगी।
गणपति उसकी प्रार्थना को टाल नहीं पाए और नाग कन्या के साथ नागलोक पहुंच गए, जहां उनका काफी मान-सम्मान हुआ। साथ ही उनके लिए वहां खान-पान का भी विशेष प्रबंध था। जब नागराज वासुकी (वासुकि वहीं सांप है, जिसने समुद्रमंथन के समय महासागर को माथा था।) ने देखा कि उनके लोक में भगवान गणेश को इतना सम्मान मिल रहा है तो वह क्रोधित हो उठा। उसने भगवान गणेश के चेहरे और पेट का भी बहुत मजाक बनाया। वासुकी की इस हरकत से भगवान गणेश अत्यंत क्रोधित हो उठे, उन्होंने वासुकी के सिर पर अपना पांव रख दिया। उसका मुकुत छीनकर खुद पहन लिया। जब इस पूरी घटना के बारे में वासुकि के बड़े भाई शेषनाग को पता चलता है तो वह बहुत क्रोधित हो जाता है और अपने भाई के पास पहुंचता है। लेकिन वहां पहुंचकर वो भगवान गणेश को देखता है तो उसका सारा गुस्सा शांत हो जाता है। वह अपने भाई को उसकी भूल का एहसास करवाकर उसे गणपति से क्षमा याचना करने को कहते हैं। इसके बाद वे गणपति को एक दिन के लिए नागलोक का राजा घोषित कर देते हैं।

हनुमानजी को नागलोक भेजकर भगवान श्रीराम ने त्यागी थी अपनी देह
सीता जी जब अपने दोनों पुत्रों लव और कुश को श्रीराम को सौंप कर धरती माता के साथ भूगर्भ में चली गईं तो श्रीराम का जीवन भी एक तरह से पूर्ण हो गया। जब श्रीराम ने देह त्यागना चाहा तो यमराज का आह्वान किया लेकिन जहां हनुमानजी होते हैं वहां यमराज नहीं आते। यमराज ने जब अपनी यह दुविधा भगवान को बताई तो श्रीराम ने अपनी अंगूठी महल में गिरा दी जो एक छोटे से छिद्र में चली गयी। हनुमानजी उस अंगूठी को ढूंढने लगे और ढूंढते ढूंढते पाताल लोक पहुंच गये। वहां नागलोक में जब नागों के राजा वासुकी को उन्होंने सारी बात बताई तो उन्होंने अंगूठियों के ढेर की ओर इशारा करते हुए कहा कि आप इसमें से अंगूठी ढूंढ लीजिये। लेकिन अंगूठी ढूंढते ढूंढते हनुमानजी को भगवान श्रीराम के देह त्यागने का आभास हो गया क्योंकि हनुमानजी के जाने के बाद श्रीराम ने यमुना नदी में दैहिक त्याग किया और उनकी अमर आत्मा पुनः बैकुंठ धाम में विष्णु रूप में विराजमान हो गयी।

काशी के नवापुरा क्षेत्र में एक शिव मंदिर है. इसे कारकोटक धाम कहते हैं. इस धाम में एक कुंआ है. इस कुएं की गहराई आज तक कोई नाप नहीं पाया. धर्मशास्त्रों के मुताबिक, इस कुएं से नागलोक पहुंचा जा सकता है. यानी ये कुंआ सीधे नागलोक जाता है. इस कुएं के दर्शन से ही नागदंश के भय से मुक्ति मिल जाती है. साथ ही इस कुएं में स्नान करने से नाग्दोश मिट जाता है. कहते हैं कि कुएं में स्नान कर दान-पुन्य करने से सारे पाप नाश हो जाते हैं. इस मंदिर में नागपंचमी के दिन ख़ास तौर पर भीड़ रहती है. यहां बड़े नाग और छोटे नाग, दोनों की पूजा होती है. बता दें कि बड़े नाग भगवान शिव के गले में विराज रहते हैं जबकि छोटे नाग उनके पैरों में लिपटे रहते हैं.

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